दूर अंतरिक्ष से आती रेडियो तरंगें पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल से गुजरते हुए बदलती हैं। वहाँ मुक्त इलेक्ट्रॉनों वाला आयनमंडल है। उसके कारण किसी तरंग का फेज, यानी उसके दोहराते उतार-चढ़ाव की स्थिति, अलग एंटेना पर अलग हो सकती है। कई एंटेना के संकेत जोड़कर बनने वाली खगोलीय तस्वीर पर इसका असर पड़ता है। IIT इंदौर के भुवनेश ब्रावर और अभिरूप दत्ता तथा सहलेखक सर्वेश मंगला ने इसी बदलाव से आयनमंडल की बनावट का अनुमान निकाला।

जमीन के माप से ऊपर का नक्शा

अध्ययन में Giant Metrewave Radio Telescope, यानी GMRT, के आँकड़े इस्तेमाल हुए। यह दूरबीन महाराष्ट्र के खोडद क्षेत्र में है; शोध की इंदौर वाली कड़ी विश्लेषण और संस्थागत संबद्धता की है। कई एंटेना मिलकर एक बड़े उपकरण की तरह काम करते हैं। हर एंटेना-जोड़ी के माप का अंतर ऊपर से गुजरते संकेतों के अलग रास्तों की जानकारी देता है।

टीम ने इन अंतरों से रास्ते में इलेक्ट्रॉनों की कुल मात्रा में स्थानिक बदलाव निकाला। उसे जोड़कर समय के साथ बदलती दो-आयामी ‘फेज स्क्रीन’ बनाई गई। इसे आयनमंडल की गणना से बनी सतह समझिए। गणना का आवश्यक आधार-मान तय करने में International Reference Ionosphere 2016 मॉडल का उपयोग हुआ।

कितने छोटे बदलाव दिखते हैं

प्रकाशित सार के अनुसार तकनीक इलेक्ट्रॉन मात्रा में लगभग 10⁻³ TECU के बदलाव के प्रति संवेदनशील हो सकती है। TECU एक स्तंभ में इलेक्ट्रॉनों की संख्या व्यक्त करने की मानक इकाई है। प्रति किलोमीटर बदलाव के माप की क्षमता भी शोध में अलग दर्ज है। ये संख्याएँ विधि और इस्तेमाल किए गए डेटा के संदर्भ की हैं।

दो तरह के काम की जानकारी

खगोलविद इस नक्शे से आयनमंडल का असर बेहतर घटाकर दूर के स्रोत की छवि सुधार सकते हैं। वायुमंडल के शोधकर्ता उसी जानकारी से इलेक्ट्रॉनों की लहर जैसी संरचनाएँ पढ़ सकते हैं। रेडियो संकेत के लिए बाधा बनने वाला असर इस तरह अध्ययन का विषय भी बन जाता है। अलग स्थानों, आवृत्तियों और परिस्थितियों में इसकी उपयोगिता जाँचना आगे का काम है। प्रकाशित पद्धति को पूरे देश की चालू चेतावनी या नेविगेशन-सुधार सेवा समझना उचित नहीं होगा।

मुख्य बातें

  • आयनमंडल के मुक्त इलेक्ट्रॉन रेडियो तरंगों की चाल और फेज को प्रभावित करते हैं।
  • अध्ययन ने महाराष्ट्र स्थित GMRT के अलग एंटेना-जोड़ों के मापों से इलेक्ट्रॉन मात्रा के स्थानिक बदलाव निकाले।
  • यह प्रकाशित शोध-पद्धति है; इसकी बताई संवेदनशीलता उपयोग किए गए डेटा और गणना के संदर्भ में पढ़ी जानी चाहिए।

स्रोत और संदर्भ

  1. IIT Indore Research Repository · Imaging ionosphere’s wave like structure using interferometry data ↗प्रकाशन-तिथि उपलब्ध नहीं
  2. Advances in Space Research · Imaging ionosphere’s wave like structure using interferometry data ↗1 अक्टूबर 2025

सार्वजनिक प्राथमिक स्रोतों पर आधारित संपादित लेख। स्रोत जाँच: 15 सितंबर 2026।

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